World-Labour-Day-Essay-in-Hindi

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प्रस्तावना: – विश्व श्रमिक दिवस (1 मई) देश-दुनिया के किसी भी कोने में चले जाइए, श्रमिकों की हालत एक जैसी मिलेगी। भारत में श्रमिक कल्याण व सुरक्षा की उच्चस्तरीय बातें भी ऐसे ही साबित हो रही हैं।

देश: – विकसित और विकासशील देश आज धरती से अंतरिक्ष और मंगल ग्रह तक छलांग लगाने को आतुर हैं। इस बात से बेखबर हैं कि आज भी हमारे आस-पास लाखों ऐसे गरीब मजदूर यथा बच्चे, वृद्ध, विकलांग, महिला एवं पुरुष रह रहे हैं जिन्हे दिन भर की हाड़तोड़ मजदूरी के बाद भी दो समय का भोजन भी नसीब नहीं होता है। उनके लिए मानवाधिकार तो बहुत दूर की बात है। आर्थिक दृष्टि से समृद्ध लोकतांत्रिक देशों के सभ्य समाज में आज भी �मजदूर� शब्द सुनते ही दिमाग में दबे कुचले, पिछड़े, गरीब एवं बदहाली में जीवनयापन करने वाले लोगों की तस्वीर कर उभर सामने आती है। सवाल यह उठता है कि आखिर असमानता का ऐसा मंजर क्यों और कब तक? दुनिया की प्रगति का पहिया आखिर कब तक मजबूरी मे लिपटे मजदूर के भरपेट भोजन एवं तन पर अदद कपड़े के सपनों को कुचलता रहेगा?

सामाजिक सुरक्षा: – किसी भी लोक कलयाणकारी सरकार एवं राष्ट्र का, लोगों की सामाजिक सुरक्षा, न्याय एवं जीने का अधिकर प्रथम कानूनी उद्देश्य होना ही चाहिए। यदि हम भारत की बात करें तो यह सवाल विचारणीय है कि इस दिशा में सरकारी एवं गैर सरकारी प्रयास कितने कारगर साबित हुए? देश के मजदूर का जीवन स्तर कितना सुधरा? वर्ष 2012 के आकंड़ों के अनुसार भारत में मजदूरों की संख्या लगभग 487 मिलियन थी जिनमें 94 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र के थे। भारत में मजदूरों की ये तस्वीर दुनिया में चीन के बाद दूसरा स्थान रखती है। सबसे हैरानी की बात तो यह है। कि पिछले दो दशक से सत्तासीन सरकारें भोजन का अधिकार, काम का अधिकार, नरेगा, एवं अन्य कई योजनाएं लाई। हर योजना में एक बात आम थी कि मजदूरों को आर्थिक लाभ तो हुआ, उनकी जेब में कुछ सरकारी खजाने से पैसे भी पहुंचे लेकिन उन्हें स्वावंलबी बनाने की दिशा में ठोस काम नहीं हुआ।

गौर करना होगा कि तकनीक देना उतना जरूरी नहीं जितना कि उसके उपयोग को सुनिश्चित करना। साथ ही उससे जुड़ी आधारभूत शिक्षा, प्रशिक्षण का प्रचार एवं प्रसार भी होना चाहिए। अन्यथा ये तकनीके �सफेद हाथी� साबित हो जाएंगे। भारत जैसे विकासशील देश के लिए मजदूर को आज की जरूरत तो है पर यह भी देखना होगा कि क्या मजदूर के काम को सुगम एवं सुरक्षित करने की तकनीक पर भी कोई काम हो रहा है? भारत में ऐसे कितने मजदूर हैं जो कार्य स्थल पर सुरक्षा कवच यानी हेलमेट, विशेष उपकरण एवं पृथक सूचक यंत्रों का इस्तेमाल करते हैं। नियोजकों को सरकारें कितना बाध्य करती हैं कि मजदूरों को ये सुविधाएं दी जाएं? सरकारी कार्योलयों, अफसरों के कमरा एवं समूह के कार्यालयों की चमक-दमक से परे गरीब मजदूर की सूरक्षा ज्यादा जरूरी है।

कारण: – दिल्ली में बैठकर बनी ये योजनाएं मजदूर के गांव तक पहुंचते-पहुंचते अपना कल्याणकारी स्वरूप खो बैठी और महज सरकारी खजाने से पैसे के उपभोग का जरिया मात्र बनकर रह गई। उनकी दूरगामी समृद्धि के प्रयास सिर्फ कागजों की शोभा बन की ही रह गई है। नरेगा में जो पैसा सरकारी खजाने से गरीब या मजदूर को मिला उसके बदले में कितना काम राष्ट्र निर्माण के लिए हुआ और उसकी जमीनी हकीकत क्या है ये आज का ज्वलंत सवाल है। राजनेता वाहवाही लूटने के लिए आपस में लड़ रहे हैं। हाल में घोषित नवीन �जनधन योजना� से एक लाभ तो होने की सम्भावना है कि सरकार एवं मजदूरों के बीच बिचौलिये की भूमिका जरूर कम हो जाएगी जो भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी कड़ी है। एक वर्ग शोषक का है तो दूसरा वर्ग शोषित का। लोक कल्याणकारी सरकारें इनमें संतुलन स्थापित करने में शुरू से आज तक लगी हैं। दोनों वर्गों की असंतुलित भागीदारी और यही बंटवारा अनेकों रूपों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से विद्रोह एवं सामाजिक अशांति का कारण बनते रहे हैं।

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