(No More President’S Rule in Uttarakhand – Essay in Hindi)

(No More President’S Rule in Uttarakhand – Essay in Hindi)

प्रस्तावना: – उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन हटने से कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राहत की सांस ली है। करीब डेढ़ माह से चली राजनीतिक उठापटक ने उत्तराखंड में राजनीतिक दलों और नेताओं की अवसरवादिता की पोल खोली ही, साथ ही सत्ता की खातिर खरीद-फरोख्त का खेल भी सामने आया है। संविधान के अनुच्छेद 356 का राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल, कोई पहली बार नहीं हुआ है पर यह पहली बार हुआ है कि सुप्रीम न्यायालय ने राष्ट्रपति शासन हटाने का फैसला सुनाया। किसी मुख्यमंत्री को शक्ति परीक्षण का मौका दिया। क्यों संविधान से मिले अधिकारों को होने लगा है बेजा इस्तेमाल? अदालतों को ऐसे मामलों में दखल क्यों देना पड़ रहा हैं? और, क्यों केन्द्र और राज्यों के बीच टकराव बढ़ने लगा हैं? क्या सत्ता के लिए प्रदेश के विकास के मुद्दे ताक पर रख देना कहां तक जायज हैं?

कांग्रेस व भाजपा: – उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में कुर्सी की छीनाझपटी का खेल सचमुच चिंताजनक है। जनता ने जिन उम्मीदों के साथ इस नए प्रदेश का स्वागत किया था, वे पूरी नहीं हो पाई। संविधान के अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को लेकर जो हुआ उसने राजनीतिक चरित्र की भयावहता को ही उजागर किया है। वहां भयावह तरीके से जंगल जल गए लेकिन राजनेताओं को कुर्सी का खेल खेलने में ही मंगल नजर आता रहा। यहां जो कुछ हुआ वह कांग्रेस व भाजपा दोनों के लिए ही सबक सिखाने वाला हैं।

उत्तराखंड के राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बाद दोनों ही मुख्य दलों पर जनमानस में शक पैदा हुआ है और अन्य दल के लिए भी वहां राह बनी हैं। इस घटनाक्रम में बड़ा संदेश यह गया है कि भाजपा सरकार ने कांग्रेस से राजनीतिक बदला लेने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया। पहले, अरुणाचल प्रदेश फिर उत्तराखंड में उथल-पूथल हुई। अब हिमाचल, मणिपुर में ऐसी कोशिशों की खबरें हैं। इसलिए मोदी सरकार को समझना चाहिए कि वे ऐसे हथकंडे से कांग्रेस मुक्त भारत नहीं कर सकते हैं। उत्तराखंड में जनता दोनों मुख्य दलों के निहित स्वार्थ, खरीद-फरोख्त से वाकिफ हो गई और वहां आगामी चुनावों में आम आदमी जैसी तीसरी दल के लिए जगह बनी है। जैसा अभी पंजाब में दिख रहा हैं।

जांच का विषय: – अब भले ही कांग्रेस के हरीश रावत ने शक्ति परीक्षण में अपना बहुमत साबित कर दिया है। लेकिन, इस घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मौजूदा विधान सभा का कार्यकाल जल्दी ही पूरा होने को है। वहां कांग्रेस विधायकों ने भी बागावत का झंडा राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उठाया था। बागावत अवसरवादिता का ही नाम है। भाजपा भले ही इसे कांग्रेस का अंदरूनी मामला बताती रही, पर बागी विधायकों को हवा कौन दे रहा है, यह साफ दिख रहा था। असंतुष्टों को हरीश रावत को हटाना था तो कांग्रेस पार्टी में दबाव बनान चाहिए। इस दौरान स्टिंग आंपरेशनों (डंक क्रिया दव्ारा व्यापारिक या औद्योगिक कार्रवाई) में विधायकों की खरीद-फरोख्त की बातें भी सामने आई। इसके लिए कौन दोषी है और कौन नहीं यह जांच का विषय जरूर होना चाहिए।

सबक: – अपनी सरकार पर आए संकट का मुकाबला अकेले हरीश रावत ने ही किया। पार्टी के बड़े नेता बयानबाजी करते रहे। भाजपा ने इस घरेलू झगड़े का लाभ उठाने का प्रयास किया। चाहे उत्तराखंड हों या फिर अरूणाचल प्रदेश या फिर दिल्ली। लोकतंत्र में जनता पर ही यह फैसला छोड़ देना चाहिए कि कौन सत्ता में रहे और कौन नहीं? भाजपा का अतिउत्साह उसके लिए सबक है। पीएम नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनावों में उत्तराखंड में परचम फहराया था। जल्दबाजी के बजाए वह जनादेश की प्रतीक्षा करते तो अच्छा रहता। मोदी �मेंक इन इंडिया� और स्किल इंडिया (निपूर्ण भारत) जैसे नारे देकर देश को नई दिशा में ले जाने की पहल कर रहे हैं लेकिन, सरकारों को येन-केन प्रकारेण अपभद्र करने के ऐसे तरीके तो केन्द्र की छवि धमिल करते दिख रहे हैं।

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