संघीय कार्यपालिका: राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति[UNION EXECUTIVE : PRESIDENT AND VICE-PRESIDENT]

संघीय कार्यपालिका: राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति[UNION EXECUTIVE : PRESIDENT AND VICE-PRESIDENT]

भारतीय संविधान में कहा गया है कि भारत का एक राष्ट्रपति होगा। संघीय कार्यपालिका की  शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी तथा वह इसका प्रयोग संविधान के अनुसार स्वयं अथवा अधीनस्थ पदाधिकारियों के द्वारा करेगा। इस प्रकार संघीय कार्यपालिका में राष्ट्रपति और मन्त्रिपरिषद् होंगे। राष्ट्रपति कार्यपालिका का औपचारिक प्रधान होगा और मन्त्रिपरिषद् कार्यपालिका की वास्तविक प्रधान।

राष्ट्रपति पद की योग्यताएं:- संविधान में राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित की वास्तविक प्रधान।
राष्ट्रपति पद की योग्यताएं:- संविधान में राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित होने वाले व्यक्ति के लिए निम्न योग्यताएं निश्चित की गयी हैं:

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  3. वह लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।

इसके अतिरिक्त ऐसा कोई भी व्यक्ति जो भारत सरकार, राज्य सरकार या किसी स्थानीय सरकार के अन्तर्गत पदाधिकारी हो, राष्ट्रपति के पद का उम्मीदवार नहीं हो सकता। इस सम्बन्ध में संघ के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्य के राज्यपाल और संघ और राज्य के मन्त्रियों को सरकारी अधिकारी नहीं समझा जायेगा।
राष्ट्रपति भारतीय संसद अथवा राज्यों के विधानमण्डल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होगा। यदि निर्वाचन के पूर्व वह इनका सदस्य है तो निर्वाचन की तिथि से उसका स्थान उस सभा से रिक्त समझा जायेगा। राष्ट्रपति अपने कार्यकाल की अवधि में कोई अन्य वेतनभोगी पद ग्रहण नहीं कर सकता।
राट्रपति का निर्वाचन
राष्ट्रपति के चुनाव के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन की पद्धति को नही, वरन् अप्रत्यक्ष निर्वाचन की पद्धति को अपनाया गया है। राष्ट्रपति का चुनाव ऐसे निर्वाचक-मण्डल द्वारा किया जायेगा, जिसमें (1) संसद में दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य, और (2) राज्य विधानसभाओं और 70वें संवैधानिक संशोधन (1992) के अनुसार संघीय क्षेत्रों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य सम्मिलित होंगे। राष्ट्रपति के निर्वाचक-मण्डल में राज्यों और अब संघीय क्षेत्रों की विधानसभाओं को इसलिए सम्मिलित किया गया है कि राष्ट्रपति न केवल केन्द्रीय शासन वरन् सम्पूर्ण भारतीय संघ का प्रधान होता है।
संसद तथा राज्यों की विधानसभाओं और संघीय क्षेत्रों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा राष्ट्रपति का चुनाव एक विशेष मत पद्धति के अनुसार होगा, जिसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति’
(Single Trasferable Vote System) कहा जाता है। इस चुनाव में मतदान गुप्त मतपत्र द्वारा होगा और चुनाव में सफलता प्राप्त करने के लिए उम्मीदवार के लिए ’न्यूनतम कोटा’ (Quota) प्राप्त करना आवश्यक होगा।’न्यूनतम कोटा’ निर्धारित करने के लिए यह सूत्र अपनाया जाता है:
दिये गये मतों की संख्या
न्यूनतम कोटा    ————————————————– 1
निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधियों की संख्या 1

न्यूनतम कोटा की व्यवस्था इसलिए की गयी है ताकि स्पष्ट बहुमत प्राप्त होने पर ही एक व्यक्ति को राष्ट्रपति का पद प्राप्त हो सके।
राष्ट्रपति के निर्वाचन की एक विशेष बात यह है कि निर्वाचक मण्डल के प्रत्येक सदस्य के मत का मूल्य समान नहीं होता। प्रत्येक सदस्य के मत का मूल्य निम्नलिखित दो सिद्धान्तों के आधार पर निश्चित किया जाता है:
प्रथम, भारतीय संघ के कुछ राज्यों (विशाल राज्यों) की विधानसभा के सदस्य अधिक जनसंख्या का और कुछ राज्यों की विधानसभा के सदस्य बहुत कम जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं विधानसभा के प्रत्येक सदस्य के मत का मूल्य उस अनुपात से निश्चित होता है, जितनी जनसंख्या का वह प्रतिनिधित्व करता है।
द्वितीय सिद्धान्त यह अपनाया गया है कि राष्ट्रपति के चुनाव में केन्द्र तथा राज्यों का बराबर का हिस्सा होना चाहिए। इसलिए सभी राज्यों और संघीय क्षेत्रों की विधानसभाओं के समसत सदस्यों के जितने मत हों, उतने ही मत संसद-सदस्यों द्वारा दिये जाने चाहिए।
राष्ट्रपति का चुनाव
संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की संख्या
राष्ट्रपति के चुनाव में समस्त राज्यों के प्रभाव में जनसंख्या के आधार पर एकरूपता रहे और समस्त राज्यों की विधानसभाओं को सामूहिक रूप में संघीय संसद के बराबर प्रभाव प्राप्त रहे। समस्त विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों की संख्याओं का योग भारत की समस्त जनता का प्रतिनिधित्व करता है और इसी प्रकार संसद के दोनों सदनों के सदस्य भी भारत की समस्त जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं अतः यह उचित है कि इन दोनों पक्षों को, जो समान रूप से भारत की समस्त जनता का प्रतिनिधत्व करते हैं, राष्ट्रपति के चुनाव में समान शक्ति प्राप्त हो।
इस प्रकार के मतों के मूल्य के आधार पर मतों की गणना की जाती है और यदि प्रथम वरीयता  के मतों की गणना में किसी उम्मीदवार को जीत के लिए आवश्यक 50 प्रतिशत से अधिक मत नहीं मिलते तो द्वितीय वरीयता के मतों की गणना कर उसके आधार पर चुनाव का निर्णय किया जाता है। अगस्त, 1969 में भारतीय राष्ट्रपति का जो पांचवां चुनाव हुआ, उसमें द्वितीय वरीयता के मतों की गणना भी आवश्यक हो गयी थी। राष्ट्रपति के चुनाव की समस्त प्रक्रिया को समझने की दृष्टि से 1969 के राष्ट्रपति चुनाव का उदाहरण ही अधिक महत्वपूर्ण है।
विधानसभा भंग होने पर भी राष्ट्रपति का चुनाव सम्भव:-1974 में जबकि राष्ट्रपति का चुनाव होना था, गुजरात विधानसभा भंग की जा चुकी थी, अतः यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि क्या गुजरात विधानसभा भंग होने की स्थिति में राष्ट्रपति चुनाव हो सकते हैं। इस सम्बन्ध में राष्ट्रपति ने 29 अप्रैल, 1974 को अनुच्छेद को 143 के अधीन सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा और सर्वोच्च न्यायालय ने अपने परामर्श में कहा कि ’’राष्ट्रपति का चुनाव वर्तमान राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने के पूर्व होना चाहिए और एक या एक से अधिक राज्यों की विधानसभा भंग होने की स्थिति में भी ये चुनाव हो सकते हैं।’’

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