मौर्य साम्राज्य-अशोक

मौर्य साम्राज्य-अशोक

 

अशोक

  • बिंदुसार की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र अशोक मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा। अशोक विश्व इतिहास के उन महानतम सम्राटों में अपना सर्वोपरि स्थान रखता है जिनका नाम सफलतम सम्राटों में है तथा भावी पीढि़याँ जिनका नाम श्रद्धा एवं कृतज्ञता के साथ स्मरण करती हैं।
  •     अशोक के शिलालेखों तथा स्तंभलेखों से अशोक के साम्राज्य-सीमा की जानकारी प्राप्त होती है तथा साथ ही इनसे उसके धर्म एवं प्रशासन संबंधी अनेक महत्वपूर्ण बातों की जानकारी भी मिलती है। अशोक पहला भारतीय राजा हुआ जिसने अपने अभिलेखों के सहारे सीधे अपनी प्रजा को संबोधित किया। 1837 ई0 में जेम्सपसे ने ब्राह्मी लिपि में लिखा एक शिलालेख पढ़ा जिसमें देवतापिय पियदस्सी (देवताओं के प्रिय, प्रियदर्शी) नामक एक राजा का उल्लेख था। कालांतर में यह तथ्य प्रकाश में आया कि यह उपाधि अशोक के लिए प्रयुक्त की गई थी। पश्चिमोत्तर में शाहबाजगढ़ी (पेशावर) तथा मानसेहरा (हजारा) से अशोक के शिलालेख प्राप्त हुए हैं। अन्य लेखों के विपरीत ये दोनों लेख खरोष्ठी लिपि में लिखे गये हैं जो ईरानी अरामेइक से उत्पन्न हुई थी। कालसी, रूम्मिनदेई तथा निगाली सागर शिलालेख तथा स्तंभलेखों से सिद्ध होता है कि देहरादून और नेपाल की तराई का क्षेत्र अशोक के राज्य में विद्यमान था। दक्षिण की ओर वर्तमान कर्नाटक राज्य के ब्रह्मगिरि (चितलदुर्ग), मास्की (रायचुर), जंटिगरामेश्वरम (चितलदुर्ग) तथा सिद्धपुर (ब्रह्मगिरि के पश्चिम) से उसके लघु शिलालेख मिलते हैं। इनसे उसके साम्राज्य की दक्षिणी सीमा कर्नाटक राज्य तक जाती है। द्वितीय शिलालेख में अशोक अपनी दक्षिणी सीमा पर स्थित चोल, पाण्ड्य, सत्तियपुत्त, केरलपुत्र तथा ताम्रपर्णी के नाम बताता है। ये सभी तमिल राज्य थे तथा उसके साम्राज्य के बाहर थे। पश्चिम में काठियावाड़ (गुजरात) में जूनागढ़ के समीप गिरनार पहाड़ी तथा उसके दक्षिण में महाराष्ट्र के थाना जिला के सोपारा नामक स्थान से उसके शिलालेख मिलते हैं। पूर्व में उड़ीसा के दो स्थानों धौली तथा जौगढ़ से भी शिलालेख मिलते हैं। बंगाल में ताम्रलिप्ति से प्राप्त स्तूप वहाँ अशोक के आधिपत्य की सूचना देते हैं।
  •     इन सभी अभिलेखों से स्पष्ट हो जाता है कि उसका साम्राज्य उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत (अफगानिस्तान) से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तथा पश्चिम में काठियावाड़ (गुजरात) से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक विस्तृत था।
  •     कश्मीरी कवि कल्हड़ की राजतरंगिणी से पता चलता है कि उसका अधिकार कश्मीर पर भी था। इसके अनुसार उसने वहाँ क्षर्मारिणी विहार में अशोकेश्वर नामक मंदिर की स्थापना करवायी थी। कल्हण अशोक को कश्मीर का प्रथम शासक बताता है। अतः उसके साम्राज्य की सीमा हिमालय पर्वत तक थी।
  •     सम्राट अशोक ने अपने अभिषेक के आठवें वर्ष (261 ई0पू0) कलिंग के विरूद्ध युद्ध किया। कलिंग राज्य वर्तमान उड़ीसा के दक्षिणी भाग में स्थित था। अशोक के तेरहवें शिलालेख से कलिंग युद्ध के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है।

अशोक की आंतरिक एवं परराष्ट्र नीति:- कलिंग युद्ध के परिणामस्वरूप अशोक बौद्ध मतानुयायी हो गया। बौद्ध संघ को अपार दान दिया और बौद्ध धर्म स्थानों की यात्रा की। अशोक ने बौद्धों का तीसरा सम्मेलन (संगीति) आयोजित किया और धर्म प्रचारकों को केवल दक्षिण भारत ही नहीं बल्कि श्रीलंका, बर्मा आदि देशों में भी भेजा।
अशोक अपने अभिलेख में अधिकारियों को बार-बार कहता है कि राजा प्रजा को अपनी संतति समझता है तथा यह बात वे प्रजा को बता दें। उसने अधिकारियों से कहा कि राजा के प्रतिनिधि के नाते वे प्रजा की देखभाल किया करें। अपने साम्राज्य में न्याय कार्य करने के लिए उसने रज्जुकों की भी नियुक्ति की।
वह कर्मकाण्डों विशेषतः स्त्रियों में प्रचलित अनुष्ठानों का विरोधी था। उसने कई तरह के पशु-पक्षियों के वध पर रोक लगा दी थी। उसने खर्चीले सामाजिक समारोहों पर भी रोक लगा दी थी। अशोक ने लोगों को ’जियो और जीने दो’ जैसा व्यवहार करने को कहा। उसने जीवों के प्रति दया और सद्व्यवहार अपनाने को कहा। उसके उपदेशों का लक्ष्य था-परिवार-संस्था और तत्कालीन सामाजिक वर्णव्यवस्था की रक्षा करना। इस प्रकार अशोक सहिष्णुता के आधार पर तत्कालीन समाज व्यवस्था को बनाए रखना चाहता था। अशोक ने अपने पड़ोसियों के साथ शांति एवं सहअस्तित्व के सिद्धांतों के आधार पर सम्बन्ध स्थापित किये। 13वें शिलालेख से पता चलता है कि उसने पाँच यवन राज्यों में अपने धर्म प्रचारक भेजे थे तथा दक्षिणी सीमा पर स्थित तमिल राज्यों चोल, पाण्डय, सतियपुत तथा केरलपुत एवं ताम्रपर्णी अर्थात् श्रीलंका में भी उसने अपने धर्म प्रचारक भेजे थे। लंका के शासक तिस्स ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया।
उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि अशोक अपने पड़ोसी राज्यों के साथ शक्ति, सहिष्णुता एवं बंधुत्व के आधार पर मधुर संबंध बनाए रखने को उत्सुक था और उसने बहुत हद तक सफलता भी प्राप्त की।

अशोक का धम्म:-

अशोक ने अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए जिन नियमों की संहिता प्रस्तुत की उसे उसके अभिलेख में ’धम्म’ कहा गया है। अशोक अपने दूसरे एवं सातवें स्तंभ लेखों में धम्म के गुणों को बताता है, जो इस प्रकार हैं-साधुता, मृदुता, पवित्रता, सत्यवादिता, दान, दया, अत्यधिक कल्याण, अल्प पाप आदि। ब्रम्हगिरि अभिलेख में इन गुणों के अतिरिक्त शिष्य द्वारा गुरु का आदर भी धम्म के अन्तर्गत माना गया है। तीसरे शिलालेख में अशोक ने अल्प व्यय तथा अल्प संग्रह को भी धम्म का अंग माना है। अशोक ने न केवल धम्म की व्याख्या की अपितु उसने धम्म की प्रगति में बाधक पाप की भी व्याख्या की है। उनके अनुसार चंडता, निष्ठुरता, क्रोध, मान और ईष्र्या पाप के लक्षण हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति को इससे बचना चाहिए।
धम्म के इन सिद्धातों का अनुशीलन करने से इस संबंध में कोई संदेह नहीं रह जाता है कि यह एक सर्वसाधारण धर्म है जिसकी मूलभूत मान्यताएँ सभी संप्रदायों में मान्य हैं और जो देश काल की सीमाओं में आबद्ध नहीं है तथा किसी पाखण्ड या संप्रदाय का इससे विरोध नहीं हो सकता।
अशोक द्वारा धम्म के प्रचार-प्रसार के उपाय:-
(1) धम्म यात्राओं का प्रारम्भ:-

  • अपने राज्याभिषेक के 10वें वर्ष बोधगया की यात्रा की जो पहली धम्म यात्रा थी।
  • राज्याभिषेक के 14वें वर्ष में नेपाल की तराई में स्थित निगाली सागर में जाकर उसने कनक मुनि बुद्ध के स्तूप के आकार को दोगुणा करवाया।
  • 20वें वर्ष बुद्ध के जन्म स्थल लुम्बिनी ग्राम जाकर शिलालेख स्तंभ स्थापित करवाया तथा पूजा की। यहाँ का कर घटाकर 1/8 कर दिया।

(2) राजकीय पदाधिकारियों की नियुक्ति:-

  • सरे एवं सातवें स्तंभ लेख से ज्ञात होता है कि अशोक ने युक्त, रज्जुक एवं प्रादेशिक नामक पदाधिकारियों को जनता के बीच जाकर धम्म-प्रचार करने एवं उपदेश देने का आदेश दिया। तथा ये अधिकारीगण प्रत्येक पाँचवें वर्ष अपने-अपने क्षेत्र में दौरा करते थे तथा सामान्य प्रशासकीय कार्यों के साथ जनता में धम्म का प्रचार करते थे।

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